आज पर्यावरण जीवन पद्धति अपनाने की आवश्यकता – डॉ. भालचंद्र नेमाडे गाँधी तीर्थ में ‘ महात्मा गाँधीजी के वस्त्रत्याग शताब्दि ‘ अवसर पर विशेष कार्यक्रम संपन्न

जलगाँव,—- महात्मा गाँधीजी की ‘ प्रेयस एवं श्रेयस’ इस प्रणाली के नुसार प्रगति करनी चाहिए। प्रगति का अर्थ वेग नहीं होता बल्कि प्रगति की सही दिशा आवश्यक होती है। इसके लिए कठोर निर्णय लेना पड़े तो भी लेना चाहिए और संस्कृति तथा पर्यावरण संजोने की दृष्टि से भी हर एक मनुष्य ने कृति करनी चाहिए। पर्यावरण जीवन पद्धति की आज अत्यंत आवश्यकता है, ऐसा आवाहन डॉ. भालचंद्र नेमाडे ने किया। डॉ. नेमाडे ने अनेक उदाहरण देकर इसका महत्त्व विशद किया। महात्मा गाँधीजी के वस्त्र त्याग शताब्दि अवसर पर, हम जो कपड़े पहनते है वह पर्यावरणपूरक, जिस परिस्थिति में रहते है क्या उस हवामान को अनुकूल है; इस संदर्भ में आत्मचिंतन करना आवश्यक है ऐसा कहां और उपस्थितों को मौसम पूरक वस्त्र अपनाने की प्रतिज्ञा भी दिलायी।

“गाँधी तीर्थ’ जलगांव में २२ सितंबर २०२१ को गाँधीजी के वस्त्र त्याग शताब्दि अवसर पर मैं यह संकल्प करता हूँ कि, पर्यावरण पूरक कपड़े परिधान करूँगा और साधी रहन-सहन यह पूज्य गाँधीजी के जमतमान्य तत्व यशासंभव आचरण में लाऊँगा।”

ऐसा कहा जाता है कि, आज की परिस्थिति में गाँधी विचारों का ह्रास हो रहा है। यदि गांधी के विचारों को व्यवहार में लाना है तो घर्षण महत्वपूर्ण है, जिससे मानवीय मूल्यों को पोषित किया जा सकता है। संपूर्ण मानवता के ब्रह्मांड में गौतम बुद्ध के बाद, गांँधी ही थे जिन्होंने भगवान महावीर सहित मानव जीवन के सभी पहलुओं को छुआ। जीवन के मूल्यों को संजोने वाले, दीन-दुखियारों तक पहुँचने वाले केवल गाँधी ही थे।

औद्योंगिक क्रांति से पहले जितनी आवश्यकता है उतना ही उत्पादन होता था परंतु उसके पश्चात के समय में आवश्यकता से अधिक उत्पादन किया गया। उसके लिए मार्केट का शोध शुरू हुआ और उसी में से हिंसा का उदय हुआ, उसी में से मनुष्य का महत्त्व कम होकर यंत्र का महत्त्व बढ़ने लगा। स्वस्त वस्तू बनाकर ग्राहकों को अधिक कीमतों में बिक्री करना इस तरह मुनाफे का अर्थशास्त्र शुरू हुआ।

‘जब तक दीन-दुखियारों को आवश्यक स्वदेशी वस्त्र प्राप्त नहीं होते तब तक मैं केवल पांचा (धोती) ही पहनुंगा!’ गाँधी  द्धारा ली गयी इस प्रतिज्ञा को 22 सितंबर 2021 को सौ बरस हो गये।

महात्मा गाँधी के वस्त्र त्याग शताब्दी अवसर पर गाँधी रिसर्च फाऊण्डेशन, जलगांव ने ‘आज गांधी आठवतांना…!’ इस विषयपर ज्ञानपीठ पुरस्कार प्राप्त वरिष्ठ साहित्यकार  डॉ. भालचंद्र नेमाडे का ऑनलाइन व्याख्यान आयोजित किया गया था। गाँधी रिसर्च फाउण्डेशन के कस्तुरबा हॉल में निमंत्रितों के सम्मुख यह कार्यक्रम आयोजित किया गया था। जिसका सीधा प्रसारण गाँधी रिसर्च फाउण्डेशन के सोशल मीडिया पर किया गया। डॉ. भालचंद्र नेमाडे के व्याख्यान के पश्चात श्रोताओं ने सवाल जवाब के माध्यम से अपनी शंकाओं का निरसन किया। जिसमें गाँधी विचारों को पुर्नरुज्जीवन करने के लिए क्या आवश्यक है? उसी तरह मराठी साहित्य में गाँधी विचार दिखायी नहीं देता, इन प्रातिनिधीक प्रश्नों पर भाष्य भी किया।

प्रारंभ में कार्यक्रम के अतिथियों का स्वागत किया गया। अनुभूति स्कूल के शिक्षक निखिल क्षीरसागर एवं भूषण गुरव ने साने गुरुजीं के ‘खरा तो एकची धर्म…’ यह प्रार्थना प्रस्तुत की। कार्यक्रम के वक्ता डॉ. भालचंद्र नेमाडे का परिचय कराया गया। इस अवसर पर महात्मा गाँधी सौ बरस पहले किये हुए वस्त्र त्याग घटना की संकल्पना के संदर्भ की डॉक्युमेंटरी उपस्थितों को दिखायी गयी। गाँधी रिसर्च फाउण्डेशन के सहयोगी चंद्रशेखर पाटील ने प्रास्ताविक किया। इस कार्यक्रम का सूत्रसंचलन कंपनी के सहयोगी ज्ञानेश्वर शेंडे ने तथा आभार प्रकटन गाँधी रिसर्च फाउण्डेशन के सहयोगी सुधीर पाटील ने किया। राष्ट्रगीत से कार्यक्रम का समापन किया गया।

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