महाराष्ट्र समेत देश और विदेशों तक कंजरभाट समाज फैला हुआ है

कंजरभाट समाज के बारेमें 

 

 मेरे प्रिय पाठकों मैंने उम्र के  पंद्रहवें साल से जैसी ही कलम थामी इसी संकल्प के साथ की जो लिखूंगा सच ही लिखूंगा,सच के अलावा कुछ नहीं लिखूंगा.अब यह बात अलग है कि सच लिखने से मुझे कितना खोना पड़ा है.मेरी कलम की खासियत ही है कि किसी की झूठी तारीफ़ ही नहीं लिखती.जब भी कागज़ पर यह  कलम कुछ उतारती है तो अंगार भरें शब्द ही उतारती है.ऐसे अंगार भरे शब्दों से मुझे भी जलना पड़ा है और आज भी जल ही रहा हूँ.लेकिन मुझे इस बात का रंजोगम नहीं है.कंजरबाड़ा का वास्तविक मूल्यांकन तो अब इतिहासविद,मिथक लिखनेवालें करेंगे. मैंने तो मात्र मेरी आँखों ने जो देखा वह कागज़ पर उतारकर मेरे पाठकों का कंजरबाड़े से साक्षात्कार कराया है.किताब छपने से पहले आयी समीक्षात्मक भूमिका और सोशल नेट्वर्किंग साइट्स से आयी प्रतिक्रिया को अगर देखा जाएँ तो मुझे लगता है कि इस किताब में संवेदना का स्पर्श इस बारीकी से हुआ है कि लगता है लेखनी को उसी की स्याही में डुबा कर लिखा गया है.मेरा प्रयास रहा है कि किताब में लिखा हर एक शब्द ऐसा हो जो ह्रदय को छूता हुआ मन को,विचारों को बदलता चला जाएं.कंजरबाड़े को लेकर हजारों लोगों में मन में इर्श्या,घृणा भरी बातें और कई गलतफहमियां देखने मिलती है.यह किताब ऐसे लोगों के मन के अंतःस्थल को छूकर विचार बदल देगी.कंजरबाड़े की ओर लोगों का देखना का नजरिया अगर यह किताब ना बदल दें तो मुझे कहना.इतना विराट परिचय यह किताब कंजरबाड़े का कराती है.

       झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में रहते हुए कंजरभाट समाज के वीर योद्धाओं ने ताकतवर ब्रिटिशों से लोहा लिया.यही वजह है कि ब्रिटिशों ने इस समुदाय को 1871 में क्रिमिनल की लिस्ट में डाल दिया.आज देश स्वतंत्र होकर 71 साल हो रहे है.कई सरकारें आयी और गयी मात्र किसी भी सरकार ने इस समुदाय पर लगा यह दाग मिटाने की ठोस पहल ही नहीं की.समुदाय के जिन लोगों ने देश के लिए अपने प्राणों की बलि चढ़ाई उनका इतिहास आज भी किसी ने सामने नहीं लाया.इस समुदाय का गौरवशाली इतिहास होने के बाद भी इतिहासकारों ने उस पर रौशनी नहीं डाली.जंगलों,पहाड़ों और खेत-खलिहानों में रहनेवालें इस समुदाय ने देश को आझाद कराने के लिए जो बड़ा योगदान दिया है उसे तो लगभग भूला ही दिया गया है.इतिहासकारों से यह भूल से हुआ है या किसी ने जानबूझकर सोची समझी साजिश,कूटनीति या राजनीति से करवाया है यह एक संशोधन का विषय है.मैं तो इसे बेहद ही शर्मनाक बात समझता हूँ. इस समुदाय के साथ पढ़े-लिखे समाज ने की हुई नाइंसाफी ही समझता हूँ.आज इस समाज का गौरवशाली इतिहास देखकर-जानकर और समझकर भारत सरकार ने स्वयं पहल कर इस समुदाय के वरिष्ठ लोगों को स्वतंत्रता सेनानियों ओहदा देकर सम्मानित करना चाहिए था.मेरे देखने में आया है कि लोग,समाज,सरकार,पुलिस, राजनेता और प्रशासन समेत सामाजिक क्षेत्र,साहित्य,शिक्षा,पत्रकारिता जैसे कई क्षेत्रों में काम करनेवालों ने इस समुदाय की सिर्फ एक बाजू देखी और इस समुदाय की महानता को बौना कर दिया.बहु आयामी,मेहनती,उद्धारक,अपने संस्कार,परम्परा,ऊँचे रीती-रिवाज बचाये रखनेवाले और नारी जाति के प्रति करुणा बिखेरकर समुदाय के उद्धार के लिए धरातल पर चलनेवाला यह समुदाय है.लगता है कि इसकी दखल इतिहास ने सही ढंग से नहीं ली.और अगर ली भी है तो किसी ने वह सामने नहीं आने दी.इतिहासकारों ने अगर इस समाज का सच्चा चरित्र,साहस की गाथा लिखी है तो वह पाठ्यक्रमों के माध्यम से समाज के सामने क्यों नहीं आयी?किसी भी सरकार ने इस समाज की वीरता की कहानियों से दुनिया को अवगत क्यों नहीं कराया?अपने बलबूते पर खड़े इस समाज को राष्ट्रिय मुख्य धारा में लाने,उनमें जागरण कर उनकी के लिए भव्य पैमाने पर आज तक अभियान क्यों नहीं चलाया गया?इस समाज में भी कई महापुरुष हुए है. राजस्थान,गुजरात,मध्यप्रदेश,जम्मू कश्मीर,महाराष्ट्र और उत्तरप्रदेश समेत पाकिस्तान की सरजमीं पर आज भी इस समुदाय के कबीलों की शूरवीरता की कहानियां गूंज उठती है.कई महापुरुष हुए है इस समुदाय में उनका जीवनचरित सरकार द्वारा छपवायी किताबों में मैंने आज तक नहीं पढ़ा.माना कि कुछ किताबों में यह बातें है भी तो सरकार के मानव विकास संसाधन मंत्रालय,सरकार के साहित्य संस्कृति मंडल ने यह बातें पुनर्जीवित कर देश की नई पीढ़ी के सामने क्यों नहीं रखी.सच तो यह है कि हमारे देश के पंजाब,हरियाणा जैसे प्रदेशों में एक गाली का नाम ही ‘कंजर’है.बात-बात में कोई भी किसी को भी ‘कंजरा’  यह गाली दे देता है.मुस्लिम,दलित,पिछडी जातिय,आदिवासी समुदायों के लिए सरकारें जिस तरह से काम कर रही है,ठीक इसी तरह से इस समुदाय के लिए अगर कुछ होता है तो यह समुदाय भी तन-मन धन के साथ भारतीय कहलाने में गर्व महसूस करेगा.
      राजधानी दिल्ली से लेकर छोटे से छोटे कस्बे से निकलनेवालें समाचार पत्रों में अक्सर इस समुदाय को लेकर ख़बरें छपती है.कंजरबाड़े में पुलिस का छापा,इतनी लीटर शराब जब्त,इतना स्पिरिट मिला.अवैध शराब का अड्डा ध्वस्त,पिंकी,रानी,नीला,मीरा,मिली,सुनीता,कविता,अनिता हिरासत में.यह महिलाओं के नाम भी अखबारवालें पूरे सरनेम पते के साथ छापते है.पुलिस वालें भी बाकायदा फोटो सेशन कर छटाक-शराब का भी हिसाब किताब पत्रकारों के सामने रखते है.समुदाय के युवाओं द्वारा हुई लूटपाट,समाज की एक प्रथा कौमार्य को लेकर बड़ी न्यूज चलाई जाती है.इलेक्ट्रानिक मीडिया भी इसमें पीछे नहीं है.हर बात को लेकर उधम मचानेवाला मीडिया कभी इस समाज झेल रहा पीड़ा को सरकार के सामने रखता है?युवाओं पर क्या बीत रही है यह बात मीडिया द्वारा समाज के सामने रखी जा रही है?सरकारी महकमें में और निजी कंपनियों में भी काम करनेवालें कर्मचारी हजारों और लाखों के नोट हर महीने गिन रहे है. व्यापारी,उद्योगपति अपने माल की कीमतें चार गुना बढ़ाकर बेच रहे है.फिर भी यह लोग रो रहे है.इन्हे भी डायन महंगाई खाई जा रही है.ऐसे में जिनके पास काम नहीं है.उनके पास रोजगार के संसाधन नहीं है ऐसे कंजरभाट के समुदाय के युवाओं के सामने प्रश्न नहीं पड़ता होगा कि वह कैसे जियें?भारतरत्न बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा है ”जो बात मांग कर नहीं मिलती उसे छीन लेना चाहिए”.ठीक ऐसी ही कार्य प्रणाली समुदाय के कुछ युवाओं की होंगी तो इसके लिए क्या सारे समुदाय पर गुनाह्गारी का बोझ थोपा जाएँ?हर बात में बुराईयां ही देखनेवालें लोगों ने इस समुदाय की अच्छाईयां भी देखनी चाहिए.कंजरबाड़ों में शुद्ध पानी नहीं,गटरें बह रही है.स्वास्थ्य,शिक्षा की व्यवस्था नहीं.सहकारी पत पेढ़ियां नहीं है.बालवाड़ी-आंगनबाड़ियां,बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं से यह समाज वंचित है.रोजगार नहीं है.किसी भी सत्ता ने यह लोगों के लिए शिक्षा,स्वास्थ्य,आर्थिक प्रगति की कल्याणकारी योजनाएं नहीं बनाई.कुछ योजनाएं बनी भी है तो सरकारी यंत्रणा ने यह लोगों तक नहीं पहुंचने दी.कोई विकासात्मक ढांचा ही इस समुदाय के पास नहीं है यह तमाम बातें भी अखबारों ने सरकार और समाज के सामने लानी चाहिए.यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि अगर इनके पास कमाई के कुछ साधन ही नहीं तो वह शराब नहीं बेचेंगे तो क्या बेचेंगे?समुदाय के कुछ लोग अपनी बस्ती में शराब बेचते है.वह घर-घर जाकर छांछ ले लो,दही ले लो,दूध लेलो कहते नहीं घूमते.सरकार और क़ानून व्यवस्था को अगर इसमें बुराई नजर आ रही है तो यह सरकारों की ही कमियां-खामियां और गलत नीतियों का असर है.सरकारों ने यह खामियां पहले सुधारनी चाहिए और इसके बाद अपनी सोच बदलकर विकास की दृष्टि से कुछ ऐसा करना चाहिए ताकि कंजरभाट समुदाय के लोग शराब बेचना तो दूर शराबियों से दूर भागे.इस बात के लिए मीडिया अगर कोई अभियान चलाता है,सामाजिक संगठनों से कोई आंदोलन चलाया जाता है तो यह समुदाय तो’ भूतो-ना-भविष्यति’ ऐसी प्रगति कर दिखायेगा.
     मैंने भी कंजरबाड़े के बारेमें,यहां के लोगों के बारेमें ऐसी ही बातें सुनी थी.जब मैं कंजरबाड़े में गया तो मैंने वहां एक अलग ही नई दुनिया देखी.यह दुनिया ही मैंने कंजरबाड़ा के माध्यम से सामने लायी है.मैंने उम्र के 14 साल कंजरबाड़ों में बितायें है.इस दौरान मैंने किसी मंत्री, एम एल ए,सांसद ,कलेक्टर या उच्च स्तरीय अधिकारियों की टीम को कंजरबाड़े में जाकर इस समुदाय से विचार -विमर्श करते नहीं देखा.यह लोगों का इस्तेमाल सिर्फ वोटिंग तक किया जा रहा है.  राजनितिक दल,नेता,सरकारी व सत्तासीन यंत्रणा तो इस समुदाय को लकीर का फ़क़ीर बनाने में लगी हुई है.यह समुदाय खुद अपने बल पर अपनी तकदीर बना रहा है.मैंने अदालतों-न्यायाधीशों को कंजरभाट समाज की महिलायें और युवाओं पर कार्रवाई करने का आदेश देते हुए देखा है मैंने कभी यह नहीं देखा कि सुप्रीम कोर्ट या हाईकोर्ट की किसी बेंच ने सरकार या प्रशासनिक यंत्रणा को जड़ तक जाकर इस शोषित समुदाय पर गहराई से अध्ययन कर विकास की दृष्टि से कोई निति बनाने का आदेश दिया हो.मैंने इस बाड़े में रहते देखा है कि दिहाड़ी मजदूर,तबके का 40 प्रतिशत हिस्सा सवेरे–शाम कंजरबाड़े में होता है.पुलिस प्रशासन को यहां जहरीली शराब की बू आती है.मैं अवैध धंधों की पैरवी नहीं करता पर पुलिस अधिकारियों और राज्य शुल्क उत्पादन विभाग के आयुक्त से सवाल करता हूँ कि देश के कितने बीयरबार,परमिट रूमों में असली शराब मिल रही है?मैं डंके की चोट पर कहता हूँ कि पूरी तरह से सभी जगहों पर असली शराब शराब नहीं मिल रही है.मिलावट वाली,नकली शराब तथा बड़े-बड़े नामों वाली ब्रांडेड कंपनियों के लेबल लगी अवैध रूपसे बनी शराब मयखानों में परोसी जा रही है. सरकारी यंत्रणा और खुफिया एजेंसियों ने ऐसा काला धंदा करनेवालें कितने लोगों को लॉक -अप में लाल,काला-नीला और पीला किया है?इनके गोदामों,शॉपों पर छापे गिरते है तो अला व्यक्ति,फला के ठिकाने पर छापा ऐसा छपता है.इस धंधों से जुड़े लोगों के नाम तक अखबारों में छपकर नहीं आतें.वहीँ कंजरबाड़े की कारर्वाई में महिलाओं के नाम क्या तस्वीरें भी छपती है.इस समुदाय की कई महिलाओं को पकड़कर पुलिस थानों में लाया जाता हैं. हफ्तें उगाई की बातें भी होती है. यह लोग बड़े कष्ट और विपत्तियों से जूझते हुए जीते है.यह लोग वक्त के साथ लड़कर अपना नसीब बदलना चाह रहे है. यह लोग औरों से इर्ष्या रख अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंचना जानते.कंजरबाड़े में आकर ही मुझे सिखने मिला कि अतीत कितना भी कठिन क्यों ना हो जिंदगी की शुरुआत दोबारा से अच्छी तरह से करनी चाहिए.इसके अलावा मैं पहले भी स्पष्ट कर चुका हूँ कि कंजरबाड़ा वह शिक्षालय है जहां आकर ही उगते सूरज की डूबती कहानी का बोध होता है.
  मैं जब कंजरबाड़े में गया तो मैंने भी यहाँ कई बार धक्के खाएं.बात तो मारपीट तक भी पहुंची.कई बार मैं कंजरबाड़े से खदेड़ा भी गया.मुझे इस समुदाय को नजदीक से देखना था.इसलिए मैंने अपना तरीका बदला इरादा नहीं.यही वजह है कि आज मैं आपके सामने यह पुस्तक रख पाया हूँ.मैंने यहां की स्त्रियों पर गौर किया.यहाँ की स्त्रियां चक्काचौंध जिंदगी जीने के लिए अपनी पवित्रता की बलि नहीं चढाती.हमेशा खोखले लोगों से दूर रहती है.उन्हें देखकर शैतानों का भी मन पवित्र हो जाता है.यहां की कई महिलायें अनपढ़ है पर वह अपने घर की इज्जत संभाले रखने में और घर -गृहस्थी चलाने में पढ़ी -लिखी महिलाओं से कई गुना समझदार है.यहां की महिलायें आदमी के कपड़ों की खुशबू -बदबू नहीं बल्कि उसका किरदार देखती है.यहां की युवतियां भी अतीत और भविष्य नहीं बल्कि वर्तमान पर ध्यान देती नजर आती है.
    कंजरबाड़ों का माहौल अब बदल रहा है.यह देख सरकारों ने इस समुदाय की उन्नति को लेकर कारगर कदम उठाना चाहिए.इस समुदाय के युवक अब बड़े धैर्य,विश्वास,श्रद्धा,नम्रता,सोच समझ-परखकर पूरी योग्यता के साथ सामने आ रहे है.कई संगठनों के माध्यम से अपने इस समुदाय में जागृति लाने और आनेवाली पीढ़ी का भविष्य उज्जवल बनाने की दृष्टि से संगठित हो रहे है.कई उभरते सितारे अब अपने समुदाय को अंधरे से निकालकर रौशन करने के लिए निकल पड़े है.जलगांव,पुणे,कोल्हापुर,इचलकरंजी,नंदुरबार,अमलनेर,मुंबई,औरंगाबाद,जोधपुर से लेकर देश के कई शहरों की युवा संगठनों ने अपने समुदाय के लिए अब अलख जगा दिया है.अब तक सरकार,पुलिस को इस समुदाय के युवक बदमाश,चोर,लूटेरे और लफंगे नजर आते थे,अब ऐसा नहीं होना चाहिए क्योंकि अब वह जंगलों से शहरों में आ गयें है.अपने हकों की लड़ाई लड़ना जान गयें है.कई युवक है जो सरकारों से सवाल पूछने की क्षमता रखते है.सरकारों ने प्रशासन और पुलिस ने अब इस समुदाय की ओर देखने का अपना नजरिया बदलना आवश्यक है.सरकारों ने अब इस समुदाय के युवाओं को उच्च शिक्षित करने पर जोर देना चाहिए.उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के प्रयास करना चाहिए.व्यवस्था को अगर लगता है कि इस समुदाय के युवक लूटेरे है तो उन्हें सुधार की दृष्टि से व्यवस्था कड़े कानून की बजाय विचार पूर्वक विकास की दृष्टि से ठोस निर्णय लेने चाहिए.दुनिया जानती है धारावी के बारेमें मुंबई की सड़कों को लहूलुहान करनेवालें कई बदमाशों का अड्डा बना था धारावी.देश में इतने अपराध नहीं होते थे,उतनें मुंबई की धारावी में होते थे.एशिया की जानी-मानी इस झुग्गी बस्ती में जाने के लिए मंत्री भी डरते थे.व्यवसायी,उद्योगपतियों से लेकर पुलिस के अच्छे-अच्छे अफसर भी बस्ती में घुसने से कतराते थे.पुलिस के पास जो हथियार नहीं है वह यहां के गुंडों के पास थे.लूटमार,डकैती,हत्या,हफ्ता उगाई,अपहरण,उठाईगिरी से लेकर दुष्कर्म और धमकाना,मारपीट,फिरौती में धारावी का हाथ कोई नहीं पकड़ सकता था.सरकार ने इस बस्ती को लेकर अपनी सोच बदली.साम-दाम-दंड की निति अपनायी.इस बस्ती को विकास की धारा से जोड़ा.पुलिस अफसरों ने कानून के साथ सोच का भी इस्तेमाल किया.यहां शिक्षा से लेकर रोजगार के अवसर मुहैय्या कराएं गयें नतीजा आज सामने है.आज इस बस्ती में स्मॉल स्केल इंडस्ट्री डालने के लिए,उद्योग लगाने के लिए देश-विदेश के उद्योगपति आगे आ रहे है.इतनी जागरूता लायी और अंडरवर्ल्ड का सफाया भी किया.यह सब सोच का कमाल है और मन से हुए प्रयासों का चमत्कार है.कंजरबाड़े को लेकर कुछ ऐसा होना चाहिए और हाँ यह भी अब जल्दी होना चाहिए. क्योंकि तूफ़ान की तरह इस समुदाय के युवक आगे आ रहे है.उनकी रफ़्तार और हौसलों को देखकर लगता है कि वह दिन दूर नहीं है जब पार्लियामेंट और विधानसभाओं में कंजरभाट समाज के युवाओं की आवाज गूंजेगी.समुदाय के सांसद होंगे,विधायक और मंत्री होंगे एक नई पहचान लेकर यह समुदाय देश के सामने होगा…….. सरकारें भी अगर ऐसा चाहती है तो अब जाग और ध्यान रखें कि यह कंजरभाट समुदाय है,इन्होने अंग्रेजों को देश से भगाया है.इनके लिए लड़ाई-झगड़ें रोजमर्रा की नहीं बल्कि आम बात है.
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                                                                                               सुनील कुमार ठाकुर
                                                                                                  जलगांव(महाराष्ट्र)
                                                                                                   9595957541
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