वैदिक घडी एवं भारतीय संस्कृति, वैदिक घड़ी

 

 

 

 

यतेन्द्र पाण्डेय्
राजस्थान, भुसावर ,भरतपुर,

 

 

 

प्रदेश संयोजक शहीद सुशील कुमार शर्मा फाउंडेशन, राष्ट्रीय अध्यक्ष सेफ इंडिया फाउंडेशन, सदस्य ट्री ग्रुप संस्थान, प्राणवायु संस्थान,

 

 

 

 

वैदिक घडी एवं भारतीय संस्कृति, वैदिक घड़ी

 

भारत विश्व गुरु ऐसे ही नहीं बना भारतीय संस्कृति एवं ऋषि मुनियों का ज्ञान हमेशा अदुत्तिय रहा है, अपने ही ज्ञान के कारण चार वेदों के साथ वेदव्यास जी ने महाभारत, बाल्मीकि जी ने रामायण जैसे ग्रन्थों की पूर्व में ही रचनाएँ की! ग्रह नक्षत्रों की चाल से दसकों पूर्व ब्रह्माण्ड में घटने वाली घटनाओं को लिपिबद्ध करना, जैसे सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रह, के साथ साथ ग्रहों के समीप से गुजरने पर प्रकृति में होने वाले बदलाव से प्रभावित, जनजीवन पर प्रभाव के वारे में अवगत कराना जैसी भारतीय संस्कृति की विशेषता है!

 

वैदिक घड़ी का हम यहाँ उल्लेख करते हैं
घड़ी की सुईयां 1 से 12 तक घूमती है! वर्तमान में घड़ी में तीन सुईयां होती है, सबसे छोटी सुई एक घन्टे का, बीच वाली मिनट एवं बडी सैकिंड का संकेत देती है

 

एक से बारह मै छुपे है वैदिक संस्कृति के रहस्य
वैदिक घड़ी की पर हम अपना ध्यान आकर्षित करते हैं, ऋषियों मुनियों द्वारा जिस प्रकार वैदिक घड़ी का निर्माण किया था,
समय शारणी अनुसार वैदिक घड़ी की व्याख्या करना भारतीय संस्कृति को नवयुवकों के सामने लाना हितकर समझते हुये अपना दायित्व महसूस करता रहा हूँ!
वैदिक घड़ी निर्माण में जिस समय के सम्मुख जो लिखा है उसकी हम 12 बजे से व्याख्या प्रारम्भ करते हैं

 

(1) 12 :00 बजने के स्थान पर आदित्य लिखा है
भारतीय संस्कृति अनुसार जिसका अर्थ सूर्य के 12 प्रकार होते हैं:-

 

अंशुमान, अर्यमन, इंद्र, त्वष्टा, धातु, पर्जन्य, पूषा, भग, मित्र, वरुण, विवस्वान, एवं विष्णु !
(1) —– 1:00 बजे के स्थान पर ब्रह्म लिखा है एको ब्रह्म द्वितीय नास्ति जीसका अर्थ ब्रह्म एक है !

 

(3) 2:00 बजे के स्थान पर अश्विनौ लिखा हुआ है, जिसका तात्पर्य अश्विनी कुमार दो हैं। अश्विनी कुमार देवताओं के चिकित्सक थे महारानी माद्री को महारानी कुंती ने एक गुप्त मंत्र दिया था ! माद्री ने उसी मंत्र से अश्विनी कुमारों का आवान किया था

 

जिससेे माद्री को नकुल एवं सहदेव अश्विनी कुमार प्राप्त हुऐ थे!

 

(4) 3:00 बजे के स्थान पर त्रिगुणा: का उल्लेख है ! जिससेे भारतीय संस्कृति, ऋषि मुनियों द्वारा लिखित पिण्डुलिपियों में तीन प्रकार के गुणों का उल्लेख है
सतोगुण, रजोगुण एवं तमोगुण

 

( 5) 4:00 के स्थान पर चतुर्वेदा: लिखा है ! जिसका तात्पर्य वेद चार प्रकार के होते हैं ऋग्वेद यजुर्वेद सामवेद एवं अथर्ववेद वेद शब्द संस्कृत भाषा के विद जाने धातु से बना है इस तरह वेद का शाब्दिक अर्थ ज्ञान है वेदना केवल भारतीय आर्यों के वर्णन हिंद जर्मन नाम से पुकारे जाने वाले समस्त आर्य समूह के हैं वेद ईश्वर यह या मानव निर्मित सूक्ष्मातिसूक्ष्म ज्ञान को परावाक कहते हैं! उसे ही वेद कहा गया है वेदों का सार उपनिषद और उपनिषदों का सार गीता है वेदों में ब्रह्म( ईश्वर )देवता, ब्रह्मांड ,ज्योतिष ,गणित ,रसायन ,औषधि ,प्रकृति ,खगोल, भूगोल धार्मिक नियम ,इतिहास ,संस्कार ,रिती रिवाज आदि लगभग सभी विषयों से संबंधित ज्ञान भरा पड़ा है जिसे वर्तमान में नई संतति को रूबरू करा कर ज्ञान भंडार की हो अग्रसर करना होगा!

 

(6) —-5:00 बजने की समय पर पंचप्राणा: लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य है कि प्राण पांच प्रकार के होते हैं अपान, समान, प्राण, उदान एवं व्यान !! पंच तत्वों में से एक तत्व वायु तत्व है और वही प्राण कल तत्व कहलाता है प्राणवायु का एक रूप है जब हवा आकाश पर चलती है तो उसे वायु कहते हैं लेकिन जब यही वायु हमारे शरीर में 10 भागों में काम करती है तो इसे प्राण कहते हैं वायु का पर्यायवाची शब्द जी प्राण है मूल प्रकृति का स्पर्श गुण वाला वायु चंचल गतिशील एवं अदृश्य है

 

(7) —- 6:00 बजे के स्थान पर षड्रसा: लिखा है, इसका तात्पर्य है कि रस के 6 प्रकार के होते हैं ,
मधुर, अमल, लवण, कटु, तिक्त एवं कसाय !
रस का शाब्दिक अर्थ है आनंद काव्य को पढ़ने का सुनने से जिस आनंद की अनुभूति होती है उसे रसके कहा जाता है रस को काव्य की आत्मा माना जाता है प्राचीन भारतीय वर्ष में रस का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है श्रव्य काव्य पढ़ने एवं दृश्य काव्य देखने से पाठक श्रोता या दर्शक को जो अलौकिक आनंद प्राप्त होता है उसे रस कहते हैं व्यवहार अनुभव और व्यभिचारी या संचारी भावों के संयोग से रस की निष्पत्ति (अभिव्यक्ति )होती है !!

 

( 8) —- 7:00 बजे के स्थान पर सप्तर्षय: का उल्लेख है जिसका तात्पर्य है सप्त ऋषि यानि सात( 7) ऋषि है!
कश्यप अत्रि भारद्वाज विश्वामित्र गौतम जमदग्नि एवं वशिष्ठ ऋषियों का उल्लेख मिलता है!
भारतीय ऋषि और मुनियों ने ही इस धरती पर धर्म समाज नगर ज्ञान विज्ञान खगोल ज्योतिष आदि की रचनाएँ की है! ऋषि ,मुनि, साधु और संत का भेद जानने के लिए जो रचनाओं का जनक वही ऋषि, जो मनन करता हो वही मुनि, जो सरल हो वह साधु एवं जो सत् में स्थिति वही संत है!

 

(9) — 8:00 बजे की स्थान पर अष्ट सिद्धिय: का उल्लेख है जिसका तात्पर्य है सिद्धियां आठ प्रकार की होती हैं अणिमा ,महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, एवं वशित्व!
सिद्धि नाम का अर्थ व्याधि यूनिक सिद्धि नाम का अर्थ उपलब्धि भगवान शिव पूर्णता या पूरा !

 

(10) 9:00 के स्थान पर नव द्रव्यणिश: का उल्लेख है, जिसका तात्पर्य निधियां 9 प्रकार प्रकार की होती हैं!
धर्म ज्ञान के अनुसार नौ निधियां होती यह मिल जाए तो सात पीढ़ियों तक धमकी कमी नहीं रहती हनुमान चालीसा में लिखा है कि अष्ट सिद्धि नव निधि के दाता अलवर दीनि जानकी माता! ग्रंथों के अनुसार सीता माता ने हनुमान जी को आठ सिद्धियां एवं नौ निधियां का वरदान दिया था हनुमान जी जब किसी भक्तों पर प्रसन्न होते हैं अपने भक्तों को प्रदान करते है !
नव निधि :— पद्म, महापद्म, नील, शंख, मुकुंद, नंद, मकर, कच्छप, खर्व!

 

(11) — 10:00 बजने के स्थान पर दश दिश; लिखा हुआ है जिसका तात्पर्य है 10 दिशाओं से है भारतीय संस्कृति अनुसार 10 दिशाएं पूरब, पश्चिम ,उत्तर ,दक्षिण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, आग्नेय, आकाश पाताल है!

 

(12) — 11: 00 बजे के स्थान पर रुद्रा: लिखा है, जिसका तात्पर्य है 11 प्रकार के रुद्र होने से है! एकादश रुद्र का विवरण सर प्रताप महाभारत में मिलता है तत्पश्चात अनेक पुराणों में एकादश रुद्र के नाम मिलते हैं परंतु सर्वत्र एकरूपता नहीं है अनेक नामों में भिन्नता भेज दी है अधिक प्रचलित नामों में कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुध्न्य,शम्भु,चण्ड और भव । एक तत्वबज है !

 

विभिन्न तथ्यों के आधार पर हम कह सकते हैं कि भारतीय संस्कृति को किस तरह से कैशलेस किया गया आज उसी संस्कृति के कारण अनेक देशों में भारतीय संस्कृति का अध्ययन कर नवीन खोजें कर रहे साथ ही भारत में कुछ देशों द्वारा भारतीय संस्कृति के अध्ययन केंद्र भी खोले गए हैं जो भारत के विभिन्न प्रांतों में स्थापित है हमें अपनी संस्कृति को पहचानना चाहिए अपनी संस्कृति को आने वाली संतति के लिए ज्ञान स्वरूप प्रदान कर उसका प्रचार प्रसार कर प्रेरित करना चाहिए कि वे संस्कृति की ओर रुझान कार अपने पूर्वजों की परंपराओं को शिष्टाचार ओं को अपनाते हुए आगे बढ़े भारतीय संस्कृति की संस्कृत भाषा वेद वेदांग पुराण उपनिषद का ज्ञान प्राप्त करने के साथ भारत को पुन: विश्व गुरु बनाने में सहयोग प्रदान करें

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