मोहम्मद रफी …. वो आवाज़ आज भी गुंजती है

– आरिफ आसिफ शेख, जलगांव

रतीय सिनेमा जगत के गायको की सूची में सबसे पहले मोहम्मद रफी साहब का नाम आता है। भारतीय फिल्म इतिहास के सबसे मशहूर और सफल गायक मोहम्मद रफी साहब !  रफी साहब के गानों में वो कशिश, वो भावुकता होती थी जिससे वह गाने श्रोताओं के मन में घर कर जाते थे। ऐसे महान अज़ीज फनकार मो. रफी साहब को आज हमारे बीच से गुजरे हुए चार दशकों का समय बीत गया। आज ही के दिन सुरों के उस्ताद मोहम्मद रफी साहब ने दुनिया को अलविदा कह दिया था| मोहम्मद रफी साहब के सदाबहार गीत आज भी लोगों की जुबां पर हैं| भारतीय फिल्म जगत को उन्होंने एक अलग पहचान दी जिसे भुला पाना नामुमकिन है। बॉलीवुड के कई गायक उनसे प्रेरित हैं| मोहम्मद रफ़ी साहब जैसे गायक बार-बार जन्म नहीं लेते| आज 31 जुलाई 2020 को मो. रफी साहब को इस जहां से रुखसत हुए 40 वर्ष बीत गये। प्रस्तुत है इस उपलक्ष्य में रफी साहब की यादों का झरोका…..
हिंदुस्तान के अज़ीज फनकार मोहम्मद रफी साहब को आज दुनिया से रुखसत हुए चार दशकों का समय बीत चुका है। रफी साहब भलेही हमारे बीच नहीं फिर भी वे हम लोगों के बीच होने का आभास होता है। अपनी आवाज़ से गीतों के रुप में रफी साहब की यादे मन में कायम संचित हो गई है। उनके गानों में ऐसी कशिश होती थी कि, वे गाने सूनने के बाद भूलाये नहीं जाते।
पंजाब के अमृतसर के कोटला सुल्तानपूर में 24 दिसम्बर 1924 को रफी साहब का जन्म हुआ। उनके बचपन का एक किस्सा बहुत ही मशहूर है है, जब उनके गांव में गीत गाते हुए एक फ़क़ीर आया करता था, तब वे फ़क़ीर के पीछे-पीछे बहुत दूर तक जाते थे और जब लौटकर आते तो वही गीत फिर सबको सुनाते| उस्ताद बड़े गुलाम अली खान ने रफी साहब को संगीत सिखाया और गाना भी सिखाया। उन्होंने अपनी गायकी की शुरुआत आकाशवाणी से की।
वर्ष 1942 में ‘गुलबलोच’ इस फिल्म में सोनी ‘ये नी हिरी ये’ यह गीत उन्होंने गाया जो उन दिनों काफी लोकप्रिय हुआ था। वर्ष 1945 में रफी साहब गायक के रूप में स्थापित हुए। उसके बाद रफी साहब ने मानों गीतों की बरसात ही की। अनमोल घड़ी, जुगनू, दो भाई, मेला, दुलारी, दिल्लगी, चाँदनी रात इन फिल्मों ने रफी साहब को एक महान फनकार की शोहरत दिलाई। ईसी दौर में किशोर कुमार जी एक गायक के रुप में शोहरत बटोर रहे थे। लेकीन रफी और किशोर कुमार की गायकी में कभी भी स्पर्धा नहीं थी। बल्कि दोनों की जोडी ने एक से एक सुपर-डुपर हिट गाने गाये। वर्ष 1950 में प्रदर्शित मीना बाजार और आँखे इन फिल्मोंने रफी साहब को टॉप गायक का खिताब दिलाया। उन्हें 1960 में चौदहवी का चाँद फिल्म के लिए पहला फिल्म फेअऱ पुरस्कार दिया गया। संगीत क्षेत्र में दिये योगदान के लिए रफी साहब को 1965 में पदमश्री पुरस्कार देकर भारत सरकार ने सम्मानित किया। रफी साहब को छह फिल्म फेअर पुरस्कार और दो राष्ट्रीय पुरस्कारों से नवाज़ा गया।
रफी साहब ने प्रेम गीत, विरह गीत, विनोदी गीतों सहित शास्त्रीय, देशभक्ति गीत, भजन, कव्वाली और मराठी गीतों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध किया। आज के इस दौर में रफी साहब जैसा गायक होना नामुमकिन है। रफी साहब की कुदरती आवाज़ उनकी सफलता का एक मुख्य कारण रहा। रफीसाहब ने अनेक गानों को अपनी आवाज देकर उन गानों को सुवर्णगीत बनाया। आदमी, ज्वारभाट, मेहबूब की मेहंदी आदि ऐसी कई फिल्मे है जो केवल रफी साहब के गानों से ही हीट हुई।
‘रंग और नुर की बारात किसे पेश करू’ , ‘बहारो फूल बरसाओं मेरा मेहबूब आया है ‘ यह गीत आज भी लोकप्रिय है जो शादी ब्याह के मौके पर बजाये जाते है। ‘बाबूल की दुवाएँ लेती जा’ इस गीत की रेकोर्डिंग करते समय तो रफी साहब सचमुच रो पडे थे। उनके गानों में एक तरह की भावुकता होती थी जो श्रोताओं का मन जीत लेती। आज भी शादी ब्याह के अवसर पर बहारों फूल बरसाओं इस गीत की धुन बजाई जाती है। यह रफी साहब का एक तरह से सम्मान ही है जो ईन गीतों को बजाया जाता है।

शास्त्रीय संगीत हो, भजन हो, बिदाई में भावुक पिता की भावनाएं व्यक्त करनी हों, विरह गीत हो, मस्ती हो, मजा हो, रोमांस हो, या फिर देशभक्ति गीत हो, हर इमोशन में, हर तरह की भावनाओं को व्यक्त करने के लिए रफी साहब बिल्कुल सही आवाज़ देते थे। “शाम फिर क्यूं उदास है दोस्त”… यह मोहम्मद रफी साहब की आवाज़ में आखरी गीत रहा। जब तक ये आवाज की दुनिया रहेगी तब तक हमेशा रफी साहब की आवाज़ सुनाई देती रहेगी। गायक भले ही बहुत से आये हो, बहुत से गायक आएंगे भी किंतु मोहम्मद रफ़ी साहब की तरह मधुरता शायद ही कहीं मिले।
अपने जीवन में मोहम्मद रफी कभी अपनी फीस के बारे में नहीं पूछा कि उन्हें गाने के कितने रुपए मिलेंगे| उन्होंने महज एक रुपए फीस लेकर भी गाना गाया है| उनके करियर की बात की जाये तो उन्होंने अपने 40 वर्ष के करियर में करीब 26,000 से ज्यादा गाने गाए| उन्होंने हिन्दी गानों के अलावा ग़ज़ल, भजन, देशभक्ति गीत, क़व्वाली तथा अन्य भाषाओं में भी गीत गाए हैं| रफी साहब की सबसे ख़ास बात यह थी कि उनकी आवाज़ हर अभिनेता पर एकदम फिट बैठती थी| दिलीप कुमार से लेकर देवानंद और शम्मी कपूर से लेकर राजेंद्र कुमार तक वे जिस किसी भी अभिनेता के लिए गाते थे तो पर्दे पर यही लगता था कि रफी नहीं वह अभिनेता ही गाना गा रहा है| फिल्म ‘नीलकमल’ का गाना ‘बाबुल की दुआएं लेती जा’ को गाते वक्‍त बार-बार उनकी आंखों में आंसू आ जाते थे|
गायक होने के साथ-साथ रफी साहब एक महान व्यक्तित्व के रुप में जाने जाते थे। गुरुदत्त, शम्मी कपूर, शशि कपूर, दिलीप कुमार, राजेश खन्ना आदि अभिनेताओं को अपनी आवाज से रफी साहब ने सफलता के शिखर पे बिठाया। जिस दिन मोहम्मद रफी साहब का निधन हुआ, उस दिन बम्बई (अब मुंबई) में जोरों की बारिश हो रही थी और माहे रमज़ान था। तो जाहिर है, वो भूखे थे। उनके हाथ और पैर पीले पड़ रहे थे। उन्हें नजदीक के अस्पताल ले जाया गया। वहां सुविधाएं नहीं थीं, तो बॉम्बे हॉस्पिटल ले जाया गया। तब तक बहुत ही रात हो चुकी थी। डॉक्टर बाहर आए और उन्होंने बताया कि वो रफी साहब को नहीं बचा पाए। रफी साहब संसार छोड़ चुके थे। वो आवाज खामोश हो गई, जिसने कई दशकों से संगीत दुनिया को मंत्रमुग्ध किया।
उस रोज तेज बारिश हो रही थी। लेकिन लोग अपने चहिते गायक रफी साहब के आखिरी दर्शन के लिए भारी बारिश में भी जनाजे में शामिल हुए। उनके सम्मान में दो दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया था। शम्मी कपूरजी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि, जब रफी साहब रुखसत हुए उस वक्त वे वृंदावन में थे, जहां उनसे कहा गया कि, ‘शम्मी साहब आपकी आवाज़ चली गई। करोड़ों लोगों को गीतों से खुश कर रफी साहब 31 जुलाई 1980 की रात ‘तुम मुझे यू भूला ना पाओंगे’ केहकर इस दुनिया से चल बसे।रफी सहाब जैसा गायक आज तक नहीं देखा गया। उनकी बेमिसाल गायकी और अनोखा अंदाज का हर कोई दीवाना था। रफी साहब की जादुई आवाज आज भी लोगों के कानों में गूंजती हैं। मोहम्मद रफी साहब आज भी अपनी आवाज के जरिये लोगो के मन में बसे हुए है।

 

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