सरकार के लाख प्रयास करने के वावजुद भी नही वदले गांवों के हालत, राज्य सरकार को पंचायत विकास अधिकारी, सचिव व संरपच लाखों करोडो रुपये का लगा रहे है चुना, मनरेगा की योजन दिखाई दे रही है विफल, मनरेगा श्रमिक ताश –पत्ती (जुआ) खेलते हुऐ कैमरे में कैद

राजस्थान संपादक एवं व्यूरो चीफ
यतेन्द्र पाण्डेय्

कामां भरतपुर से हरिओम मीणा की रिपोर्ट

कामां —जहां एक और राज्य सरकार गरीब मजदूर परिवार के लिए हर संभव प्रयास करती नजर आ रही है वहीं दूसरी तरफ पंचायत समिति के विकास अधिकारी, सचिव व जनप्रतिनिधि, सरपंच लाखों करोड़ों रुपए का राज्य सरकार को चूना लगाते नजर आ रहे हैं। राज्य सरकार द्वारा गांव कस्बों में मनरेगा कार्यो में लाखों करोड़ों रुपए खर्च करने के बावजूद भी प्रत्येक गरीब परिवार को रोजगार देना चाहती है लेकिन जमीनी धरातल पर मनरेगा योजना विफल होती नजर आ रही है ऐसा ही जीता जागता मामला कामा पंचायत समिति की ग्राम पंचायत सतवास में देखने को मिला ।
सरपंच ब्रजलाल फौजी ने चुनावी प्रचार में भोली-भाली जनता से अनेकों वादे किए थे जिनमें से बिजली, पानी, सड़क आदि की सुविधा ग्राम वासियों को मुहैया कराई जाएगी। साथ ही सरपंच बृजलाल फौजी का गांव की भोली-भाली जनता से वादा था कि प्रत्येक गरीब परिवार को मनरेगा योजना में रोजगार दिलाया जाएगा ।
जिसके अंतर्गत मनरेगा योजना में गरीब परिवारों को आजीविका चलाने व कमाने का मौका दिया जाएगा। लेकिन वास्तव में जमीनी धरातल पर ऐसा देखने को कही भी नहीं मिला।

पारम्परिक कहावत के अनुसार “अंधा बांटे रेवड़ी फिर – फिर अपनेन को दे ,,वाली कहानी हुई चरितार्थ ।
यानी कि हम कहें बृजलाल फौजी ने अपनी ग्राम पंचायत की भोली भाली जनता को रोजगार न देकर मनरेगा श्रमिक योजना का अपने चहेतों को ही फायदा दे डाला। यानी कि हम कहें अपने परिवार वालों को ही फायदा दे डाला ।
सरपंच के करीबी जो लोग दिन रात उठते बैठते हैं उनके बच्चे अभी 20 साल पूरे भी नहीं कर सके यानी कि कहे हम अभी वे बच्चे विद्यालयों में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं उन्हें ही मनरेगा योजना में लाभ (रोजगार) दे डाला।वहीं दूसरी तरफ गांव के बेहद जरूरतमंद गरीब परिवार से जुड़े लोग श्रमिक योजना में अपना नाम जुड़वाने के लिए सरपंच के चक्कर पर चक्कर लगाते नजर आ रहे हैं सरपंच गरीब लोगों से वादे जरूर करते हैं लेकिन बातों पर खरा उतरना नामुमकिन दिखाई दे रहा है ।

मनरेगा योजना में चल रही सूरजकुंड पर मिस कॉल को लेकर जब हमने पंचायत समिति से जुड़े अधिकारियों से जानकारी ली तो पता चला कि अभी तक पंचायत समिति का कोई भी विकास अधिकारी व सचिव चैक करने नही पहुचता है। आखिरकार क्या कारण है कि पंचायत समिति के विकास अधिकारी व सचिव फर्जी वालों की शिकायत आने के बावजूद भी निरीक्षण करने क्यों नहीं पहुंचते?।
क्या मनरेगा योजना में चल रही धांधलेबाजी में इन अधिकारियों का भी है सहयोग या फिर जानबूझकर विकास अधिकारी हो रहे हैं अनजान। क्या प्रशासन के अधिकारी फर्जी मिस्ट्रोल चलाने वाले मैठ व सचिव पर कर पाएंगे उचित कार्यवाही।

करीब 1 वर्ष से लॉकडाउन चल रहा है जिसके कारण जो लोग अपनी रोजी-रोटी कमाने के चक्कर में कारखानों में काम करते थे वह लोग भी दर-दर की ठोकरें खाने को गांव में ही भटक रहे है।।

कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती जब न्यूज़ संवाददाता हरिओम मीणा फर्जी मिस्ट्रोल की सूचना पर मौके पर पहुंचे तो वहां पर कुछ और ही नजारा देखने को मिला जहां पर 50 श्रमिकों की संख्या में मनरेगा कार्य चल रहा था वहीं पर वास्तविक रुप से करीब 20 -22 लोग ही नजर आए।इसमें से भी कुुुछ ताश – पत्ती के खेलों में मस्त नजर आए।जब संवाददाता ने मिस्टरोल पर मौजूद मैठ से संपर्क किया तो मैठ ने बेबसी जताई।

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